न्यूज रूटीन @ सरसींवा (सारंगढ़-बिलाईगढ़) नया शिक्षा सत्र शुरू हुए लगभग एक माह होने वाला है, लेकिन क्षेत्र के कई शासकीय स्कूलों में आज भी बच्चों को पूरी पाठ्य पुस्तकें नहीं मिल पाई हैं। स्कूलों में पढ़ाई तो शुरू हो गई है, लेकिन किताबों के बिना बच्चे सिर्फ शिक्षक की बात सुनने तक सीमित हैं। घर जाकर पढ़ाई करने और अभ्यास करने का कोई साधन नहीं होने से उनकी पढ़ाई लगातार पिछड़ रही है।
सबसे ज्यादा परेशानी उन गरीब परिवारों के बच्चों को हो रही है, जो बाजार से किताबें खरीदने की स्थिति में नहीं हैं। बिना किताबों के वे न तो पाठ समझ पा रहे हैं और न ही परीक्षा की तैयारी कर पा रहे हैं। नई कक्षा का पहला महीना लगभग खत्म होने को है, लेकिन जिम्मेदार विभाग अब तक व्यवस्था दुरुस्त नहीं कर पाया है। इसका असर सिर्फ बच्चों पर ही नहीं, बल्कि शिक्षकों पर भी पड़ रहा है। किताबें नहीं होने से शिक्षक पूरे पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाई नहीं करा पा रहे हैं। कई जगह उन्हें अलग-अलग नोट्स बनवाकर या बोर्ड पर लिखकर पढ़ाना पड़ रहा है, जिससे समय भी बर्बाद हो रहा है और पढ़ाई की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। ऐसे में समय पर सिलेबस पूरा करना भी बड़ी चुनौती बन गया है।
हैरानी की बात यह है कि यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। पिछले शैक्षणिक सत्र में भी कई विद्यार्थियों को समय पर किताबें नहीं मिल सकी थीं। हर साल वही लापरवाही, वही बहाने और नुकसान सिर्फ बच्चों का। सवाल यह है कि जब स्कूल खुलने की तारीख पहले से तय रहती है, तब किताबों की छपाई और वितरण की तैयारी समय रहते क्यों नहीं की जाती? आखिर हर साल बच्चों के भविष्य के साथ यही लापरवाही क्यों दोहराई जाती है?
शिक्षा को सरकार की प्राथमिकता बताया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे किए जाते हैं, फिर भी बच्चों के हाथों तक समय पर किताबें नहीं पहुंच पा रही हैं। विभाग की सुस्त कार्यप्रणाली का खामियाजा मासूम विद्यार्थी भुगत रहे हैं।
अब अभिभावकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने मांग की है कि सभी स्कूलों में तत्काल पूरी पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएं, ताकि बच्चों की पढ़ाई पटरी पर लौट सके। यदि जल्द व्यवस्था नहीं सुधरी, तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों के परिणाम, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और उनके भविष्य पर पड़ेगा।