न्यूज रुटीन @ सारंगढ़। जिला अस्पताल सारंगढ़ में सुरक्षा और सफाई व्यवस्था के नाम पर चल रहे भ्रष्टाचार में अब तक का सबसे बड़ा और सनसनीखेज खुलासा हुआ है। अस्पताल में न केवल गरीब कर्मचारियों का मानसिक उत्पीड़न कर बंधुआ मजदूरों की तरह शोषण किया जा रहा है, बल्कि सूत्रों से मिली पक्की जानकारी के मुताबिक, एक तकनीकी और कानूनी रूप से 'एक्सपायर्ड' (अवधि पार) हो चुकी ठेका कंपनी को पिछले कई महीनों से अवैध रूप से जिंदा रखकर सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है।
श्रम विभाग के नियमों की धज्जियां उड़ाकर चल रहे इस पूरे खेल के पुख्ता सुबूत अब सामने आ चुके हैं, जिससे स्वास्थ्य महकमे की ईमानदारी का पूरी तरह जनाजा निकल गया है।
खुलासा: जब 2024 में ही खत्म हो गई मियाद, तो भुगतान कैसे?
सरकारी टेंडरों और श्रम नियमों के अनुसार, किसी भी संस्थान में मैनपावर सप्लाई करने के लिए संबंधित क्षेत्रीय लेबर ऑफिस से जारी जीवित और वैध लाइसेंस होना अनिवार्य शर्त है। लेकिन जिला अस्पताल में नियमों को किस कदर रसूखदारों की जेब में रखकर घूमा जा रहा है, इसे आधिकारिक दस्तावेज 1000430671.jpg से साफ समझा जा सकता है:
31मार्च 2024 को ही खत्म हो चुका है लाइसेंस: छत्तीसगढ़ सरकार के श्रम विभाग द्वारा 'परफेक्ट सिक्योरिटी सर्विस' (प्रोप्राइटर: बाली राम सिंह) को जारी लाइसेंस नंबर RPR/2023/44031688 की वैधता अवधि स्पष्ट रूप से 01/03/2023 से 31/03/2024 तक ही दर्ज है। कानूनन यह लाइसेंस अपनी मियाद पूरी कर चुका है।
सूत्रों का बड़ा दावा—अवैध रूप से बांटी जा रही है मलाई: सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, इस लाइसेंस की अवधि खत्म होने के बाद भी ठेका एजेंसी का टेंडर जिला अस्पताल में धड़ल्ले से चालू रखा गया है। अस्पताल के सिविल सर्जन बिना किसी री-वेरिफिकेशन या जीवित क्षेत्रीय लाइसेंस के, आंखें मूंदकर इस अवैध हो चुकी एजेंसी के लाखों रुपये के बिल हर महीने पास कर रहे हैं।
क्षेत्रीय और संख्या बल के नियमों का भी हुआ कत्लेआम
सामने आए दस्तावेज 1000430670.jpg और 1000430671.jpg एक और गंभीर जालसाजी की ओर इशारा करते हैं:
सारंगढ़ का लाइसेंस ही नहीं: इस लाइसेंस में कार्य का स्थान (Place of Work) 'समता कॉलोनी, रायपुर' और मुख्य नियोक्ता का नाम 'एम.डी. हॉस्पिटल्स एंड आई.सी.यू., रायपुर' दर्ज है। एमडी हॉस्पिटल के प्रबंधन का कहना है कि उनके यहां किसी भी एजेंसी को सफाई एवं सुरक्षा का ठेका नहीं दिया गया है, परफ़ेक्ट सिक्योरिटी सर्विस के द्वार फर्जी लेटर पेड और शील बनवाकर लेबर लाइसेंस बनवा लिया गया है ना हे हॉस्पिटल प्रबंधन के द्वारा वर्कऑर्डर जारी किया गया है ना हे फॉर्म वी दिया गया है ऐसी फर्जी एजेंसी को ब्लैकलिस्ट किया जाए व कानूनी कार्यवाई की जाए इस एजेंसी के पास सारंगढ़ जिला अस्पताल के लिए कोई वैध क्षेत्रीय लेबर लाइसेंस है ही नहीं।
सीमित संख्या का उल्लंघन: लाइसेंस में केवल 20 कॉन्ट्रैक्ट लेबर्स रखने की अनुमति दी गई है, जबकि अस्पताल में सफाई और सुरक्षा को मिलाकर इससे कहीं अधिक पदों का स्वीकृत ढांचे का भुगतान सरकारी तिजोरी से निकाला जा रहा है।
सीधे और तीखे सवाल: इस अंधेर नगरी का असली आका कौन?
जब सरकारी कागज खुद गवाही दे रहे हैं कि एजेंसी का लाइसेंस खत्म हो चुका है और वह इस क्षेत्र के लिए वैध भी नहीं है, तब भी यह टेंडर किसके रसूख पर चल रहा है?
बिना वैध लाइसेंस के किसी भी सरकारी संस्थान में ठेके पर काम कराना और भुगतान उठाना श्रम कानूनों के तहत एक गंभीर और दंडनीय अपराध है। क्या सिविल सर्जन ने सिर्फ भारी कमीशन की 'मलाई' डकारने के लिए इन कागजातों को फाइलों के नीचे दबाए रखा?
भारतीय मानव अधिकार संगठन के मुख्य सचिव द्वारा सीधे कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर अस्पताल के भीतर हो रहे मानवाधिकारों के हनन और पीएफ-ईएसआईसी के गबन की बात कही जा चुकी है। अब इस दस्तावेजी सुबूत के बाद जिला प्रशासन की चुप्पी कई बड़े सवाल खड़े करती है।
क्या जिला कलेक्टर इस पुख्ता जालसाजी के सामने आने के बाद तत्काल टेंडर निरस्त कर सिविल सर्जन और ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कराएंगे, या फिर रसूखदारों के दबाव में गरीबों के हक और सरकारी पैसे की लूट यूं ही जारी रहेगी?
हर भ्रष्ट चेहरे के बेनकाब होने तक, यह बेबाक और बेधड़क पड़ताल जारी रहेगी!