Balod news : बालोद जिले के ग्राम अरमरीकला में गली पर अवैध कब्जा: तीन वर्षों से प्रशासनिक सुस्ती, ग्रामीण परेशान

संक्षेप

ग्रामीण गली पर अवैध कब्जा: तीन साल बाद भी प्रशासन मौन, दबंगों की बेलगाम दादागिरी

Balod news : बालोद जिले के ग्राम अरमरीकला में गली पर अवैध कब्जा: तीन वर्षों से प्रशासनिक सुस्ती, ग्रामीण परेशान

विस्तृत खबरें

न्यूज रुटीन @ बालोद जिले के ग्राम अरमरीकला में गली पर अवैध कब्जा: तीन वर्षों से प्रशासनिक सुस्ती, ग्रामीण परेशानबालोद। जिले में लचर प्रशासनिक व्यवस्था के कारण ग्रामीणों को हो रही परेशानी थमने का नाम नहीं ले रही। ग्राम अरमरीकला में सुरेश कुमार साहू (पिता फिरंता साहू), केसर बाई (पति सुरेश), सुनील बाई (पति राजेश) साहू ने बांस-बल्ली और पुराने कपड़ों से गांव की मुख्य गली को अवरुद्ध कर दिया है। इसकी शिकायतकर्ता अगरहिज नागवंशी ने 16 दिसंबर 2022 को गुरूर थाना और तहसील में दर्ज कराई थी, लेकिन तीन साल बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।विभागीय अधिकारियों ने महज औपचारिकता निभाते हुए रास्ता खोला, पर कब्जा करने वालों पर कोई सख्ती नहीं की। अगरहिज ने 11 जनवरी 2023 को अनुविभागीय अधिकारी गुरूर को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 (पब्लिक न्यूसेंस) के तहत आवेदन दिया, किंतु अब तक कोई सुनवाई नहीं। एक ओर जिला प्रशासन सुशासन की दुहाई देता है, वहीं एक दबंग व्यक्ति गांव की गली बंद कर खुली चुनौती दे रहा है।परेशानी का आलम बयां करते शिकायतकर्ता
अगरहिज नागवंशी ने बताया, "मैं किसान हूं। जहां कब्जा हुआ है, उसी जगह मेरे मकान का निर्माण चल रहा था। धान लाने-ले जाने में रास्ता बंद होने से भारी परेशानी हो रही है। निर्माण सामग्री (छड़, सीमेंट, रेत-गिट्टी) 100 मीटर दूर से ढुलवाने में 25 हजार रुपये अतिरिक्त खर्च हो गए।" वे कई बार आवेदन दे चुके हैं, लेकिन अधिकारी अनदेखी कर रहे हैं।सुरेश साहू को पंचायत से आबादी भूमि मिली थी, जहां उन्होंने घर बनाया। लेकिन घर के पास की गली को बढ़ाकर जबरन बंद कर अतिरिक्त कब्जा किया गया। विरोध करने पर जाति सूचक गालियां देकर धमकाया जाता है। सुरेश खुलेआम कहते हैं, "शिकायत करो, कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।" कलेक्टर जनदर्शन में भी राहत नहीं मिली।कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता ने मौका-मुआयना कर रास्ता खोलने और कब्जा करने वालों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि ऐसी लापरवाही से गांव में तनाव बढ़ रहा है। प्रशासन की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं—क्या यह मौन सहमति है?