न्यूज रुटीन @ बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अधिकारों से जुड़ा एक अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस बीडी गुरु की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि 'मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961' का लाभ केवल नियमित कर्मचारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि दैनिक वेतनभोगी, मस्टर-रोल, संविदा कर्मी और कॉलेजों में कार्यरत अतिथि व्याख्याता (Guest Lecturers) भी इसका पूरा सवेतन लाभ पाने के हकदार हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर रोका हुआ वेतन अदा करने का निर्देश दिया है।
केस की पृष्ठभूमि में रायपुर की शिल्पी शुक्ला (34) का नाम है। शुक्ला 22 नवंबर 2022 से शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ कॉलेज में अतिथि व्याख्याता (Guest Lecturer - Grade I) के रूप में कार्यरत रही हैं। गर्भावस्था के दौरान उन्होंने 13 सितंबर 2025 से मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया था, जिसे कॉलेज प्रबंधन ने स्वीकृत किया। प्रसव व अवकाश अवधि पूरा होने के बाद वह 20 मार्च 2026 को ड्यूटी पर लौट आईं तथा 18 मई 2026 को धारा 5 के अंतर्गत छुट्टी का वेतन जारी करने के लिए विभाग को अभ्यावेदन दिया था, जिसका विभाग ने खारिज कर दिया।
उच्च शिक्षा विभाग ने शिल्पा को 'अतिथि कर्मचारी' बताते हुए वेतन न देने का निर्णय लिया। इस निर्णय के खिलाफ शिल्पा ने बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका का पक्षधर अधिवक्ता शुभम तिवारी ने दावा किया कि मातृत्व लाभ एक मानवीय अधिकार है और शिल्पा नियमित व्याख्याता की भांति कार्यरत होने के कारण किसी भी प्रकार के भेदभाव की समस्या का शिकार नहीं हो सकतीं।
राज्य की तरफ से उप-सरकारी वकील अनुजा शर्मा ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता नियमित कर्मचारी नहीं हैं, अतः मातृत्व लाभ के वित्तीय दायित्व उन पर लागू नहीं होते। परंतु कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि गर्भावस्था के समय किसी महिला को कठोर श्रम करने के लिए बाध्य करना उसके तथा गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य के हित में हानिकारक है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों और मातृत्व लाभ अधिनियम की धाराओं विशेषकर धारा 12(2)(ए) तथा धारा 27 का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यह लाभ अनुबंध की प्रकृति से परे लागू होता है और अधिनियम ऐसा कहीं निर्दिष्ट नहीं करता कि लाभ केवल नियमित स्टाफ तक सीमित रहेगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिनियम के उद्देश्य और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15, 39 व 42 के नीति-निदेशक तत्वों के अनुरूप यह लाभ दैनिक वेतनभोगी, आकस्मिक श्रमिक और अतिथि फैकल्टी पर भी समान रूप से लागू होता है। मामले में याचिकाकर्ता ने कॉलेज में नियमित कार्यभार निभाया है; इसलिए केवल 'अतिथि' टैग के आधार पर उनके मातृत्व अवकाश का वेतन रोकना गैरकानूनी व अमानवीय है। अदालत ने निदेश दिया कि विभाग ने एक बार छुट्टी मंजूर कर ली थी, अतः वेतन रोकने का अधिकार नहीं रखता।
विधिक विशेषज्ञों के अनुसार यह आदेश अतिथि और संविदा कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण प्रासंगिकता रखता है और भविष्य में ऐसे कई मामलों में मिसाल बन सकता है। राज्य सरकार इस निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती है।